Thursday, March 5, 2015

होली तो हो ली

होली तो हो ली

होली तो हो ली,
अब भी है क्या, कही मस्तों की टोली ?
अब है कटु बोली
या बची है,  होली की अद्भुत हंसी - ठिठोली ?

काले पुते रंगों का हाल
या बचा है सुर्ख लाल हुए गाल ?
न सत व्यवहार, सिर्फ व्यविचार
या कहीं है प्यार और मनुहार ?

बेतुके से गीतों की भीड़
या कहीं है फाग और फगुआ का नीड़ ?
कुछ ढूंढे बैठे खाली, या फिर
अपने अनतरमनं में बैठी नयी नवेली ?

देखें मतंगों की टोली
या बन बैठे मस्तो के हमजोली ?
कर ले रंगो से दुरी,
या नए रंग भर ले जैसे ये सतरंगी होली।

Friday, February 27, 2015

कुछ दिनों से आँगन में चहचाहट नहीं


कुछ दिनों से आँगन में चहचाहट नहीं

कुछ दिनों से आँगन में चहचाहट नहीं,
कुछ दिनों से घर में कोई आदत नहीं है
अभी कुछ भी बिखरा नहीं
ये घर कुछ दिनों से अकेला है
इसमें कोई आहट नहीं।

चहुँ ओर नीरसता है
कही कोई मुस्कुराहट नहीं
इन दिनों गमलों में कोई फूल नहीं
और कहीं फूलों में सुरभि भी नहीं
ये घर कुछ दिनों से अकेला है
इसमें कोई आहट नहीं।

कुछ कहीं गुम है
जैसे कहीं कोई चाहत नहीं
काफी दिनों से शाखों पे नए कोंपले नहीं
कुछ दिनों से पत्तों में चटक रंग भी नहीं है
ये घर कुछ दिनों से अकेला है
इसमें कोई आहट नहीं।

मुस्कुराहटें भी अब आती नहीं
जैसे नदियों में पानी तो है
पर कलरव - कल कल की वाणी नहीं
तुम्हारी मासूम सी मुस्कुराहट के बिना,
मेरी बिटिया,
ये घर कुछ दिनों से अकेला है
इसमें कोई आहट नहीं।

वो तुम्हारी छोटी - छोटी शरारतें
नन्हे मीठे से सुर भरे बोल
तुम्हारे बिना, मेरी बिटिया
सब शुन्य है , कहीं कुछ सवाल नहीं
ये घर कुछ दिनों से अकेला है
इसमें कोई आहट नहीं।

Tuesday, February 24, 2015

उन उदास रंगों में रमना चाहता हूँ


उन उदास रंगों में रमना चाहता हूँ

कुछ कहना चाहता हूँ
इस साँझ के झरोके में
क्षितिज के पार
उन उदास रंगों में रमना चाहता हूँ।

छितराई हुई मैली सी इस साँझ में खोना चाहता हूँ
संध्या के प्रहर जब लाली अपने को समेटती है
उस पल में भरपूर उतारना चाहता हूँ
उन उदास रंगों में रमना चाहता हूँ।

प्रकृति के अबूझ विस्तार में
उषा से संध्या के राज में
जब जीवन खोता है
उस पल को समझना चाहता हूँ
उन उदास रंगों में रमना चाहता हूँ।

किरणों के समक्ष चमकते या डूबते
उन सभी विस्तारों को पाना चाहता हूँ
उन रंगो के परे अबूझ से विस्तृत
सभी नहीं तो कुछ ही सही
सीमाओं को जानना चाहता हूँ
उन उदास रंगों में रमना चाहता हूँ।

कुछ कहना चाहता हूँ
इस साँझ के झरोके में
क्षितिज के पार
उन उदास रंगों में रमना चाहता हूँ।  

Tuesday, February 17, 2015

इ मनुष्य त मझधारी अछि


इ मनुष्य त मझधारी अछि।


मोन त उल्लास के तरंग से आतुर अछि
मुदा, विचित्र निश्तब्धता के साथी अछी
कलरव सुनलौं पंछी के,
देखलौं क्षितिज पर नीरस मेघ
मोन त व्याकुल अछि
गोधूलि के बेला में
मोन कियाक प्रताड़ित अछि

सब पंछी उड़ल अपन व्यवहार
किछ त एहि में परिभाषित अछि
केयो नहीं बिसरल रीत अपन
हम सब कियाक नहीं अनुगामी छी
डगर कतय नगर कतय
नीर अपन नहीं जानि
नहीं किछ व्यवहारिक अछि
इ मनुष्य त मझधारी अछि

किछ त मनुष्यक दोष अछि
किछ त मोनक प्रयोग अछि
बिसरलौं सब अपन जिम्मेवारी
अपन स्वार्थक क्रोध बड्ड भारी
मूल नहीं घर नहीं
गाम नहीं, किनहुँ नहीं
किछ के नहि अधिकारी अछि
इ मनुष्य त मझधारी अछि

मोन त उल्लास के तरंग से आतुर अछि
मुदा, विचित्र निश्तब्धता के साथी अछी
कलरव सुनलौं पंछी के,
देखलौं क्षितिज पर नीरस मेघ
मोन त व्याकुल अछि
गोधूलि के बेला में
मोन कियाक प्रताड़ित अछि

इ मनुष्य त मझधारी अछि।  

Thursday, January 29, 2015

ब्रम्हांड में सबका अपना एक कोना है


ब्रम्हांड में सबका अपना एक कोना है

ह्रदय की धुरी में अनर्थ का गचना है
सशंकित हैं, फिर भी मन का रसना है ,
संक्षिप्त इस राह में तृष्णा है,
निश्चित हिं,
ब्रम्हांड में सबका अपना एक कोना है

त्रिशंकु बन कर रमना है
मोक्ष की आशा है, फिर भी माया के भंवर में बहना है
सत्कर्म, स्वार्थ का भंजक बन उपहास उड़ाना है,
निश्चित हिं,
ब्रम्हांड में सबका अपना एक कोना है

निश्चित ही यमधार का सामना है
फिर भी, नहीं कहीं मन्दाक्ष का गहना है
संकुचित जगत में असीम उड़ान है
निर्भय हो उस सत पथ पर जाना है
निश्चित हिं,
ब्रम्हांड में सबका अपना एक कोना है।

ह्रदय की धुरी में अनर्थ का गचना है
सशंकित हैं, फिर भी मन का रसना है ,
संक्षिप्त इस राह में तृष्णा है,
निश्चित हिं,
ब्रम्हांड में सबका अपना एक कोना है  

Wednesday, January 14, 2015

सब एकाकी हैं



सब एकाकी हैं

सब एकाकी हैं , क्या सुख दुःख के साथी हैं ?
मृत्यु के पथ पर इस जीवन में कौन अविनाशी है। 

अद्वितीय इस जगत के,
व्युह में जाने को सब आतुर हैं 
अजय कोई नहीं मृत्यु के सब संभावित हैं 
भीड़ में भी सब अतिजन के वासी हैं 
अंगारिणी के राह में अंतर्ज्ञान ही महारथी है 
सब एकाकी हैं , क्या सुख दुःख के साथी हैं ?

सरपट राह पर बाधाओं की बारिश है 
अपने अपने अधिगमन से,
अनट के अधिकारी हैं। 
चक्र में जो साथी है, वो कंसारी है। 
जो उसको जाने वो मनुष्य अविकारी है। 
सब एकाकी हैं , क्या सुख दुःख के साथी हैं ?

सब एकाकी हैं , क्या सुख दुःख के साथी हैं ?
मृत्यु के पथ पर इस जीवन में कौन अविनाशी है।



Wednesday, December 24, 2014

क्या नया साल आया है ?




क्या नया साल आया है ?
मैंने तो नहीं देखा, हाँ लेकिन इसका शोर बहुत है
देखें ?

अख़बारों के पन्नो में,
टीवी के चैनलों में,
रंग बिरंगे जश्नो में,
और मदमाते बहकते क़दमों में.
शायद नया साल है।

लोगों की बातों में,
सोशल साइट्स में,
मैसेज में, मोबाइल में,
और बॉलीवुड कि पार्टियों में,
शायद नया साल है।

रंग बिरंगे लुभावने ऑफर में,
सेल के खेल में, नए नए मॉल में,
बागों के एकांत में,
और कुछ ठेकों में,
शायद नया साल है।

सर्दी के मौसम में,
कोहरे की चादर में,
ठठुरन भरी हवाओं में,
और शायद मेरे मन में भी,
नया साल आया है,

नया साल आया है ?
देखें ?