Thursday, May 30, 2013

किछ उदासी



किछ उदासी

कि कहु , कि लिखु
मोंन के कोई भेद नहि , मोंन के कोई प्रपंच नहि .

किछ विचार नहि , किछ उल्लास नहि ,
अछी कतेक मनुहार , अछी कतेक प्यार
अछी नहि जानी कि व्यवहार
छी किछ व्यत्तिथ , छी किछ अनुतरित


मोंन नहीं उदास तथापि अछी किछ प्रयास
नहि जानी की मुदा
नहीं जनि की विचार

Monday, April 22, 2013





बिसरलौ सब किछ मनपसंद ,
छुटल नव पल्लव नव उमंग,
वो महुआ क मादक सुगन्ध ,
वो आमक मंजरिक सुवसित सुगन्ध ,


भोरक पुरबिया में रमल शीतल मंद पवन
ठेट दुपहरी के अंगार बनल सूरज क जलन
और रातिक चाँद के शीतल किरण 

Sunday, March 10, 2013

कुम्भ की भीड़

समाचार में पढ़ा की कुम्भ के मेले में बहुत लोग , ज्यादातर बूढ़े खो गए हैं और राहत शिविर में अपनों की आस में दिन बीता रहे हैं .  उसी परिप्रेक्ष्य में कुछ पंक्तिया मन में आई .


कुम्भ की भीड़ 

कुम्भ की भीड़, ढूंढे फिर भी हम अपना नीड़ 
छोड़ गए वो, क्या आयेंगे वापस,
अपनाएंगे फिर से क्या , हो कर अधीर .

निकले घर से पुण्य कमाने , गंगा में डुबकी लगाने 
धुल गए पाप फिर भी क्यों नहीं हैं वो गंभीर ,
क्या कमी नहीं खलेगी उन्हें हमारी ,
क्या वो रह पाएंगे ?
नहीं बहायेंगे वो भी नीर .

अब इन बूढी आँखों में , दर्द है, पानी है और मन है अधीर 
हम जिनको कहते थे अपना , जिनमे देखा जीवन अपना 
दिया उन्होंने हि पीर , नहीं बहायेंगे वो भी नीर 

बूढी आँखें , झुका तन , कोई अब आस नहीं 
अब तो आये यमराज हि, ले चले अपने पास ही 
पर छोड़ दिया या भूल गए इसका कोई जवाब नहीं .

कुम्भ की भीड़, ढूंढे फिर भी हम अपना नीड़ 
छोड़ गए वो, क्या आयेंगे वापस,
अपनाएंगे फिर से क्या , हो कर अधीर .


Saturday, February 16, 2013


शुभ कामना 

नयी अनुभूति, नयी इक्षा , 
है अब नयी प्रतीक्षा 
जीवन की होगी अब एक नयी परिभाषा 
मन में अब है नयी उमग , 
होने वाली हैं अब खुशियों की वर्षा .

कुछ नए ख्वाबों का खुलेगा दरवाजा 
कुछ सपने सच होने को है 
कुछ नए अनुभव का भी होगा सामना 
नृप श्री से जो मिलने वाली है दिव्या 
उस अवसर पर हो सौभाग्य की वर्षा 

Saturday, January 19, 2013

सर्द मौसम में बारिश झमाझम 

सर्द मौसम में बारिश झमाझम ,

देखलौ एहन बरखा और भिजल मोन .
प्रकृति रूप अपरूप और इ अबूझ मोन 
सर्द मौसम में बारिश झमाझम .

इ थिक मौसम के फेर ,
स्वागत नै क सकलौं बरखा के इ बेर ,
ठण्ड में रहलौं तन मन से इ बरखा से नज़र फेर 
इ थिक मौसम के फेर ,

Sunday, December 30, 2012

शर्मसार

जो घटना घट  गया , अनहोनी कुछ हो गया ,
समाज के हि कुछ दरिंदो ने , 
एक ज़िन्दगी रौंद दिया .

सब हैं आक्रोश में , विचारों के झंझावात में,
न जाने या क्या हो गया ,
चुप थे सब पहले , खामोश रह कर सब सहते ,
पर इस हैवानियत ने , कर दिया सबको शर्मसार ,
समाज के हि कुछ दरिंदो ने,
एक ज़िन्दगी रौंद दिया।

आवाज जो उठी है आज,
पुकार रही इंसानियत को ,
और दे रही ललकार बदनीयत को,
तुमने रौंदा एक जिंदगी ,
नहीं सहेगी कोई अब ये दरिंदगी ,

पर हम भी कुछ सोचे ,
नारे लगाने से पहले मन में देखें 
सब हैं हमारे आस पास 
कितना सुनते हम दिल की आवाज  
अभी ये बात हुई , तो समाज की बात उठी .
पर इसी समाज से एक जिंदगी
रौंद दी गयी।

सोचें कुछ तो हम सोचें ,
या कहे करे , समाज की बेहतरी के लिए कुछ .
ताकि फिर न हो शर्मसार सभी 

Saturday, October 13, 2012



  हमर मोंन में 




अछी किछ बेचैनी मोंन में,
बुझु त किछ हलचल मोंन में ,
किछ कही नहि सकलौं इ अबूझ मोंन में ,
बुझु आहां किछ त हमार मोंन ,
आहां अपन मोंन में. 
आइब जाऊ ल क अपन संसार  हमर मोंन में . 

देखलौं वो मुस्कान बिटिया के अपन मोंन में ,
देखलौं वो मनुहार , वो दुलार अपन मोंन में ,
केलों याद हम आहां के बिटिया संग अपन मोंन में ,
आइब जाऊ ल क अपन संसार  हमर मोंन में .

अछी कतेक नेह आहां से,
कि कहु हम अपन मोंन में ,
एतेक दूर भेलौं आहां से ,
कि कहु हम अपन मोंन में,
बुझलौं इ थिक समयक फेर ,
भेल दुरी में भी स्नेह ,
कि कहु हम अपन मोंन में,
आइब जाऊ ल क अपन संसार  हमर मोंन में .