Saturday, February 16, 2013


शुभ कामना 

नयी अनुभूति, नयी इक्षा , 
है अब नयी प्रतीक्षा 
जीवन की होगी अब एक नयी परिभाषा 
मन में अब है नयी उमग , 
होने वाली हैं अब खुशियों की वर्षा .

कुछ नए ख्वाबों का खुलेगा दरवाजा 
कुछ सपने सच होने को है 
कुछ नए अनुभव का भी होगा सामना 
नृप श्री से जो मिलने वाली है दिव्या 
उस अवसर पर हो सौभाग्य की वर्षा 

Saturday, January 19, 2013

सर्द मौसम में बारिश झमाझम 

सर्द मौसम में बारिश झमाझम ,

देखलौ एहन बरखा और भिजल मोन .
प्रकृति रूप अपरूप और इ अबूझ मोन 
सर्द मौसम में बारिश झमाझम .

इ थिक मौसम के फेर ,
स्वागत नै क सकलौं बरखा के इ बेर ,
ठण्ड में रहलौं तन मन से इ बरखा से नज़र फेर 
इ थिक मौसम के फेर ,

Sunday, December 30, 2012

शर्मसार

जो घटना घट  गया , अनहोनी कुछ हो गया ,
समाज के हि कुछ दरिंदो ने , 
एक ज़िन्दगी रौंद दिया .

सब हैं आक्रोश में , विचारों के झंझावात में,
न जाने या क्या हो गया ,
चुप थे सब पहले , खामोश रह कर सब सहते ,
पर इस हैवानियत ने , कर दिया सबको शर्मसार ,
समाज के हि कुछ दरिंदो ने,
एक ज़िन्दगी रौंद दिया।

आवाज जो उठी है आज,
पुकार रही इंसानियत को ,
और दे रही ललकार बदनीयत को,
तुमने रौंदा एक जिंदगी ,
नहीं सहेगी कोई अब ये दरिंदगी ,

पर हम भी कुछ सोचे ,
नारे लगाने से पहले मन में देखें 
सब हैं हमारे आस पास 
कितना सुनते हम दिल की आवाज  
अभी ये बात हुई , तो समाज की बात उठी .
पर इसी समाज से एक जिंदगी
रौंद दी गयी।

सोचें कुछ तो हम सोचें ,
या कहे करे , समाज की बेहतरी के लिए कुछ .
ताकि फिर न हो शर्मसार सभी 

Saturday, October 13, 2012



  हमर मोंन में 




अछी किछ बेचैनी मोंन में,
बुझु त किछ हलचल मोंन में ,
किछ कही नहि सकलौं इ अबूझ मोंन में ,
बुझु आहां किछ त हमार मोंन ,
आहां अपन मोंन में. 
आइब जाऊ ल क अपन संसार  हमर मोंन में . 

देखलौं वो मुस्कान बिटिया के अपन मोंन में ,
देखलौं वो मनुहार , वो दुलार अपन मोंन में ,
केलों याद हम आहां के बिटिया संग अपन मोंन में ,
आइब जाऊ ल क अपन संसार  हमर मोंन में .

अछी कतेक नेह आहां से,
कि कहु हम अपन मोंन में ,
एतेक दूर भेलौं आहां से ,
कि कहु हम अपन मोंन में,
बुझलौं इ थिक समयक फेर ,
भेल दुरी में भी स्नेह ,
कि कहु हम अपन मोंन में,
आइब जाऊ ल क अपन संसार  हमर मोंन में . 


Sunday, October 7, 2012


कुछ दिल के फ़साने बेक़रार 




बाते करनी थी तुम से कई हज़ार ,
कहने थे कुछ दिल के फ़साने बेक़रार ,
दूर हो तुम तो क्या कहे अब हम,
अब बस अपने ख्वाबों में ही 
कह दे दिल की बाते दो चार 


मेरी नन्ही सी मुस्कान 






मेरी नन्ही सी मुस्कान , जो है मेरा मन  प्राण ,
वो मेरी प्यारी बिटिया ,
मेरे जीवन की नयी पहचान ,
बन गयी है मेरा नया आधार, 
मेरी नन्ही सी मुस्कान , जो है मेरा मन  प्राण .

रच गयी है मेरे संसार में
ले आई जीवन में अरमानो कि नयी उड़ाने,
हम सबकी नयी अनुभूति 
हम सब कि नयी पहचान,
मेरी नन्ही सी मुस्कान , जो है मेरा मन  प्राण .

दिए हैं उसने जीने के नए आयाम,
देखना है उसके साथ कुछ नए रंगों को 
अब तो बस वही है, वही है,
हमारे अधरों कि मुस्कान   
मेरी नन्ही सी मुस्कान , जो है मेरा मन  प्राण 

हमारे लिए अब है सब कुछ वो,
रहे हमेशा खुश वो, 
हम सब कि प्यारी बिटिया 
हमारी नन्ही अरमान 
मेरी नन्ही सी मुस्कान , जो है मेरा मन  प्राण 




Saturday, September 22, 2012

निर्मल अद्भुत प्रत्यक्ष


निर्मल  अद्भुत  प्रत्यक्ष  



मैंने समझाया अपने आप को.
नहीं देख सकता उस अदृस्य को.
वो तो अद्भुत है , पालक है जगत का जो
उस अनंत परमेश्वर को 
नहीं देख सकता मैं , उस अदृश्य को.
जो है इस नश्वर संसार की सब बातो में.

की उसने रचना सबकी..
है जगत का कारक जो,
जिसने सबको है भरमाया,
उस निरंतर प्रकृति के सृजनहार को,
नहीं देख सकता उस अदृस्य को.
जो है इस नश्वर संसार की सब बातो में.

पर क्या सब नहीं हैं उसके 
प्रत्यक्ष प्रकृति के अनुपम  सृंगार  को
देख सकता हूँ उसके सारे उपहार को
उस निरंतर प्रकृति के सृजनहार को,
पर , नहीं देख सकता उस अदृस्य को.
जो है इस नश्वर संसार की सब बातो में.

रमा हुआ है जो ब्रम्हांड में 
योगियों के महायोग में,
और मुनियों के संसार में.
कोटि कोटि नित नूतन व्यवहार में 
नहीं देख सकता उस अदृस्य को.
जो है इस नश्वर संसार की सब बातो में.

वो है इस माया में 
वो है इस चराचर जगत के आधार में
वो है प्रकृति के सृंगार में
नर के नारायण में 
पर , नहीं देख सकता उस अदृस्य को
जो है इस नश्वर संसार की सब बातो में.

अभी नहीं समझा में इन गूढ़ बातों को
अभी नहीं जाना मैंने इस ज्ञान को
अभी तो समझने की कोशिश में हूँ अपने छोटे से संसार को
जो हर समय कुछ अनुभूति देता है ,
नए नए प्रयोग के आधार में 
नहीं देख सकता उस अदृस्य को
जो है इस नश्वर संसार की सब बातो में.

है वो सामान रूप से इस ब्रह्माण्ड में 
है मेरे आस पास हर समय अनेकों रूपों में
पर नहीं जान सकता उसे ,
दिए हैं अनगिनत अनुभूति 
दिए हैं विभिन्न विश्वासों के आधार 
और दिए हैं कितने अविश्वाश भी
नहीं देख सकता उस अदृस्य को
जो है इस नश्वर संसार की सब बातो में.

वो तो अमिट, अनंत , अनश्वर और न जाने क्या क्या है
वो तो हर जगह , समय से परे है.
देखने के लिए शायद मेरे पास नहीं है वो निर्मल विचार 
क्योंकि मैं मनुष्यों हूँ, दूषित विचारों से ग्रसित हूँ,
है वो निर्मल , है वो अद्भुत , है वो प्रत्यक्ष 
पर मैं हिं हूँ अपने विचरों और कर्मो से दूषित 
इसलिए नहीं देख सकता उस अदृस्य को
जो है इस नश्वर संसार की सब बातो में.